Wednesday, July 02, 2014

अलाव (Alaaw)


I am a big fan of Gulzar Sahab - a poet par excellence. Every-time I listen to him recite his poems I get so mesmerized by his voice.He is a magician of words. His soul stirring poetry never fails to evoke unknown dormant sentiments..

रात भर सर्द हवा चलती रही
रात भर हमने अलाव तापा
मैंने माज़ी से कई खुश्क सी शाखें काटी
तुमने भी गुज़रे हुए लम्हों के पत्ते तोड़े
मैंने जेबों से निकाली सभी सूखी नज़्में
तुमने भी हाथों से मुरझाए हुए खत खोले
अपनी इन आँखों से मैंने कई मांझे तोड़े
और हाथों से कई बासी लकीरें फेंकी
तुमने पलकों पे नमी सूख गयी थी सो गिरा दी
रात भर जो भी मिला उगते बदन पर हमको
काट कर डाल दिया जलते अलावों में  उसे 
रात भर फूकों से हर लौ को जगाये रखा
और दो जिस्मों के ईंधन को जलाये रखा 
रात भर बुझते हुए रिश्तों को तापा हमने.....