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Thursday, June 19, 2025

कभी यहाँ ज़िंदगी बसा करती थी..


 गाँव के सिरे पर एक पुरानी हवेली खड़ी है - जर्जर, अकेली, और ख़ामोश। कभी इसकी दीवारों पर रंग हुआ करता था, आज वहाँ सीलन और दरारें हैं। लकड़ी के दरवाज़े अब कराहते हैं, जैसे समय का बोझ सहते-सहते थक चुके हों। दीवारों पर लिपटी बेलें और झूलते जाले इस बात की गवाही देते हैं कि बहुत वक़्त गुज़र चुका है।


मगर अगर आप ध्यान से सुनें… बहुत ध्यान से… तो कुछ आवाज़ें अब भी गूंजती हैं।

चूड़ियों की खनक, पायल की छन-छन, हँसी की खिलखिलाहट… जैसे ज़िंदगी अब भी कहीं छिपी बैठी हो। जैसे हवेली की दीवारें आज भी उन लम्हों को अपने भीतर समेटे हुए हों।

कभी यह हवेली महज़ एक इमारत नहीं थी — यह एक धड़कता हुआ जीवन था।

यहाँ सुबहें रंगोली और तुलसी के चारों ओर भजन से शुरू होती थीं। दोपहरें बच्चों की दौड़-भाग में बीतती थीं। शामें कहानियों से सजी होती थीं, और रातें संगीत, चाँदनी और महफ़िलों की गवाह होती थीं। आंगन में पेड़ की छांव में कितने ही फैसले लिए गए, कितनी चिट्ठियाँ लिखी गईं, और कितनी ही आँखें नम हुईं।

आज वही हवेली सूनी है। खामोश। मानो वह भी किसी अपने को खो चुकी हो।

इसकी दीवारें अब सिर्फ ईंट-पत्थर नहीं, बल्कि यादों की कब्रगाह हैं। हर कमरा एक किस्सा है, हर बंद खिड़की एक अधूरी कहानी। हवेली अब इंतज़ार नहीं करती - वह सिर्फ बचे हुए सन्नाटे में साँस लेती है।

और इस सन्नाटे में एक गहरा संदेश छिपा है - ज़िंदगी क्षणभंगुर है।

हम जो कुछ भी बनाते हैं, संजोते हैं, जीते हैं… वह सब समय के साथ मिटता चला जाता है।

जो रह जाती है, वह है गूंज।

शायद हवेली आज भी किसी को पुकार रही है - किसी ऐसे को जो उसे सजाए नहीं, बल्कि समझे।

जो उसकी देहरी पर बैठे, एक दीप जलाए और कहे -

“मैं तुझे देखती हूँ… और तुझे याद करती हूँ।”

क्योंकि कुछ घरों का मक़सद बस रहना नहीं होता -

उनका होना ही एक श्रद्धांजलि है।


क्या आपने भी कभी ऐसा कोई घर देखा है, जो ख़ुद एक दास्तान बन चुका हो ?


Copyright Renu Vyas 


Saturday, June 14, 2025

कभी चुप रह कर भी देख लीजिए…




कभी चुप रह कर भी देख लीजिए…

हर बार बोलना ज़रूरी नहीं,

हर जंग जीतना जरूरी नहीं।

कुछ बातों को वक्त पे छोड़ दीजिए,

शायद सुकून पा लेंगे।


जब लफ़्ज़ तीर बन जाएं,

और दिल घावों से भर जाए,

तब मौन की चादर ओढ़ लीजिए,

शायद टूटते रिश्ते फिर जुड़ जाएँ।


हर सच ज़ाहिर करना जरूरी नहीं,

हर तकरार में आवाज़ उठाना जरूरी नहीं।

कभी किसी की नज़र से भी सोचिए,

कई ग़लतफ़हमियाँ मिटा लेंगे।


कभी अहं को किनारे रखकर,

मुस्कराकर सुन भी लीजिए,

रिश्तों की दरारें भर जाएंगी,

दिल फिर से करीब पा लेंगे।


तो कभी चुप रह कर भी देख लीजिए 

शायद कई रिश्ते बचा लेंगे 


Copyright Renu Vyas