कुछ मोहब्बतें इंसानों से नहीं होतीं।
कुछ मोहब्बतें शब्दों से होती हैं। आवाज़ों से होती हैं। उन एहसासों से होती हैं जो बिना छुए, बिना मिले, हमारी रूह में कहीं घर बना लेते हैं।
मेरे लिए ऐसी ही एक मोहब्बत है गुलज़ार के शब्दों से और भूपिंदर की आवाज़ से।
मैंने न जाने कितनी बार इन पंक्तियों को सुना और पढ़ा है
“नज़्म उलझी हुई है सीने में
मिसरे अटके हुए हैं होठों पर
लफ़्ज़ काग़ज़ पे बैठते ही नहीं
उड़ते फिरते हैं तितलियों की तरह…”
और हर बार ऐसा लगा जैसे किसी ने मेरे ही मन की कोई अनकही बात चुरा कर लिख दी हो।
गुलज़ार सिर्फ़ लिखते नहीं हैं, वे एहसासों को शब्दों का शरीर दे देते हैं। उनकी नज़्मों में बारिश सिर्फ़ बारिश नहीं होती, धूप सिर्फ़ धूप नहीं होती, और ख़ामोशी तो कभी ख़ामोश होती ही नहीं। वह बोलती है, पुकारती है, याद दिलाती है, और कभी-कभी बहुत देर तक हमारे साथ बैठी रहती है।
लेकिन फिर इन शब्दों को जब भूपिंदर की आवाज़ मिलती है, तो कुछ और ही हो जाता है।
भूपिंदर की आवाज़ में एक अजीब-सी थकान है, जैसे ज़िंदगी को बहुत क़रीब से देखा हो। एक नरम उदासी है, जैसे कोई पुरानी याद अब भी दिल के किसी कोने में सांस ले रही हो। उनकी गायकी में कोई दिखावा नहीं, कोई शोर नहीं। बस एक सादगी है, जो सीधे दिल तक पहुँच जाती है।
जब वे गाते हैं
“कब से बैठा हुआ हूँ मैं जानम
सादा काग़ज़ पे लिख के नाम तेरा …”
तो ऐसा लगता है जैसे कोई शायर शाम के धुंधलके में अपने पुरानी लकड़ी के मेज़ पर झुका बैठा हो, सामने सफ़ेद काग़ज़ रखा हो, और सारी दुनिया की कविताएँ लिखने के बाद भी उसे सिर्फ़ एक नाम लिखना सबसे सुंदर कविता लगता हो।
शायद यही वजह है कि मैं इन दोनों के फ़न से इतना जुड़ाव महसूस करती हूँ।
गुलज़ार की नज़्में मुझे हमेशा उन पुराने दिनों में ले जाती हैं जहाँ शामें थोड़ी लंबी होती थीं, और मोहब्बत को हर वक़्त ज़ाहिर करना ज़रूरी नहीं समझा जाता था। वहीं भूपिंदर की आवाज़ उन यादों पर जैसे कोई मुलायम-सी चादर बिछा देती है।
आज के शोर भरे दौर में, जहाँ हर चीज़ तेज़ी से गुज़र रही है, गुलज़ार और भूपिंदर मुझे ठहरना सिखाते हैं।
एक नज़्म के एक मिसरे पर रुक जाना।
एक आवाज़ में छुपी ख़ामोशी को सुनना।
और यह समझना कि कभी-कभी सबसे मुकम्मल कविता वही होती है जिसमें सिर्फ़ किसी का नाम लिखा हो।
“बस तेरा नाम ही मुकम्मल है
इस से बेहतर भी नज़्म क्या होगी…”
शायद इसी लिए मैं गुलज़ार के शब्दों से और भूपिंदर की आवाज़ से मोहब्बत करती हूँ।
क्योंकि वे मुझे मेरी अपनी ख़ामोशियों से मिलवाते हैं।
Copyright Renu Vyas


