कभी चुप रह कर भी देख लीजिए…
हर बार बोलना ज़रूरी नहीं,
हर जंग जीतना जरूरी नहीं।
कुछ बातों को वक्त पे छोड़ दीजिए,
शायद सुकून पा लेंगे।
जब लफ़्ज़ तीर बन जाएं,
और दिल घावों से भर जाए,
तब मौन की चादर ओढ़ लीजिए,
शायद टूटते रिश्ते फिर जुड़ जाएँ।
हर सच ज़ाहिर करना जरूरी नहीं,
हर तकरार में आवाज़ उठाना जरूरी नहीं।
कभी किसी की नज़र से भी सोचिए,
कई ग़लतफ़हमियाँ मिटा लेंगे।
कभी अहं को किनारे रखकर,
मुस्कराकर सुन भी लीजिए,
रिश्तों की दरारें भर जाएंगी,
दिल फिर से करीब पा लेंगे।
तो कभी चुप रह कर भी देख लीजिए
शायद कई रिश्ते बचा लेंगे
Copyright Renu Vyas

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