हम क्या बन गए हैं, सोचो ज़रा,
अंग्रेज़ी तारीख़ों पर केक काटें,
नव वर्ष मनाएँ, मोमबत्तियाँ जलाएँ,
पर जब क्रिसमस आए द्वार खटखटाने,
उसे तुलसी के नाम से ढक जाएँ।
जन्मदिन भी मनाते हैं कैलेंडर से,
पर त्योहारों में बाँट लेते हैं इंसान।
धर्म की दीवारें इतनी ऊँची कर लीं,
कि पड़ोसी का उत्सव दिखता ही नहीं।
केक की मिठास सबको भाती है,
पर किसी और की खुशी क्यों खलती है ?
क्यों अपने रंगों को ही सच मानकर,
दूसरों के रंगों से आँख चुराते हैं ?
छोटी-छोटी राजनीति में उलझकर,
बड़े रिश्ते तोड़ते चले जाते हैं।
नाम बदल देने से क्या बदलता है,
जब दिलों में नफ़रत बोते जाते हैं ?
क्यों न दीप भी जलें, सितारे भी चमकें,
ईद की सिवैयाँ, क्रिसमस का गीत,
गुरुपर्व की वाणी, होली के रंग
सब मिलकर जीवन बनें एक संगीत।
कौन रोकता है हमें खुश होने से ?
कौन सिखाता है दोष ही ढूँढना ?
अगर प्रेम ही धर्म का सार है,
तो क्यों भूल गए हैं उसे जीना ?
आओ पूछें खुद से आज यही
हम क्या बन गए हैं, और क्यों ?
अगर साथ हँसने में ही जीवन है,
तो साथ मनाने से डर कैसा हो ?

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