पुराने ज़माने की ख़बरें - जब टीवी न्यूज़ में गरिमा और सच्चाई हुआ करती थी
कभी-कभी मन करता है कि रिमोट उठाकर आज की टीवी न्यूज़ को म्यूट कर दूँ — और फिर याद आता है वो दौर, जब ख़बरें सच में ‘ख़बरें’ होती थीं।
80 और 90 के दशक में टीवी पर न्यूज़ का अपना एक समय होता था — सुबह, दोपहर और रात के तयशुदा स्लॉट्स। दूरदर्शन की सादगी भरी प्रस्तुति, न्यूज़ रीडर्स का संयमित लहजा, बिना चीख़-चिल्लाहट के साफ़-सुथरी भाषा और तथ्यों पर आधारित रिपोर्टिंग — सब कुछ इतना संतुलित और गरिमामयी होता था कि देखने-सुनने के बाद मन शांत हो जाता था।
न कोई ब्रेकिंग ब्रेकिंग का शोर, न ‘सबसे तेज़’ बनने की होड़।
न्यूज़ पढ़ने वाले एंकर स्क्रीन पर बैठकर ‘स्टार’ बनने की कोशिश नहीं करते थे। वे खबर का माध्यम होते थे, खुद खबर नहीं। उनका काम था सूचना देना, न कि दर्शकों की भावनाओं से खेलना।
फिर धीरे-धीरे टीवी न्यूज़ ‘24x7’ हो गई। ख़बरें अब एक समय में सीमित नहीं रहीं — दिन-रात का शोर मचता रहा। रिपोर्टिंग की जगह ‘राय’ ने ले ली, और तथ्यों की जगह ‘भावनाओं’ ने। न्यूज़ स्टूडियो डिबेट स्टेज में बदल गए। एंकर अब पत्रकार नहीं, रिंग मास्टर बन गए। चीख़ते हुए, उँगलियाँ उठाते हुए, बीच में टोकते हुए — जैसे बस टीआरपी का तमाशा चल रहा हो।
आज का न्यूज़ डिबेट देखिए — एक साथ 6–8 चेहरे स्क्रीन पर, सब अपनी-अपनी बात चिल्ला रहे हैं, कोई किसी को सुन नहीं रहा। माहौल ऐसा जैसे किसी शादी में DJ बज रहा हो और सब अपना-अपना डांस कर रहे हों। और हद तो तब हो जाती है जब डिबेट में गाली-गलौज, और कभी-कभी हाथापाई तक हो जाती है वो भी लाइव कैमरे पर।
कभी सोचिए, हम सच में न्यूज़ देख रहे हैं या कोई रिएलिटी शो?
इस शोर में सच्ची ख़बरें कहीं दब जाती हैं। आम आदमी की समस्याएँ, किसानों की हालत, शिक्षा-स्वास्थ्य जैसे मुद्दे, सब इन चीख़ती-चिल्लाती बहसों में गुम हो जाते हैं।
वो दौर जब रात के 9 बजे की न्यूज़ देखने के बाद मन में एक गंभीरता आ जाती थी, अब कहीं खो गया है। आज न्यूज़ देखने के बाद या तो ग़ुस्सा आता है या बेचैनी। विश्वसनीयता का संकट ऐसा है कि लोग सोशल मीडिया पर वायरल पोस्ट को ज़्यादा भरोसेमंद मानते हैं।
ज़रूरत है एक बार फिर उस पुराने संतुलन की ओर लौटने की। जहाँ न्यूज़ का मतलब सिर्फ सनसनी नहीं, बल्कि ज़िम्मेदारी भी हो। जहाँ एंकर का काम दर्शकों को उकसाना नहीं, बल्कि समझाना हो। और जहाँ ख़बरें मनोरंजन का साधन नहीं, समाज को दिशा देने का माध्यम हों।
कभी दूरदर्शन की वो ब्लैक एंड व्हाइट न्यूज़ बुलेटिन फिर से देखिए — कम से कम उसमें सच्चाई, सम्मान और सलीका तो था।
Copyright Renu Vyas

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