कभी हंसाती थी खूब
तो कभी रुला देती थी
“छुटियों में मिलने आऊँगी” लिख के
मिलने की उम्मीद जगा देती थी चिठ्ठियाँ
“हम सब यहाँ ठीक हैं”,
ये दिलासा दे जाती थी
सभी बड़ों को प्रणाम, छोटों को प्यार लिख
चेहरों पे मुस्कान ले आती थी चिठ्ठियाँ
कभी “जल्दी ही मनी ऑर्डर भेज दूँगा”
एक आश्वासन दे जाती थी
तो कभी राखी पर चावल कुमकुम
अपने साथ लिये आ जाती थी चिठ्ठियाँ
“माँ बाबा का बहुत ध्यान रखना”
ये समझाने जो आ जाती थी
“तुम सब की बहुत याद आती है”
वो स्नेह व प्यार वाली चिठ्ठियाँ
डाकिये की आवाज़ पे दौड़ के
किवाड़ की ओट से उठाई
ज़ोर ज़ोर से पढ़ के भी सुनाई
सबको साथ बिठाने वाली चिठ्ठियाँ
ना जाने कैसे और कहाँ खो गई
वो हम और आप को जोड़ती
हाल अब किसी का बताती नही
पता नही क्यो आती नही है चिट्ठियां…
Copyright Renu Vyas

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