जड़ें या ज़ंजीरें
जड़ों से जुड़ना पहचान है,
पर क्या हर पहचान को
ढोना ज़रूरी है?
क्यों परम्पराएँ,
जो सुख न दें,
फिर भी हमारी नियति बन जाती हैं?
क्यों ठहरते हैं हम
उन दीवारों के भीतर,
जहाँ सम्मान से ज़्यादा
चोटें मिलती हैं?
क्या जड़ें सच में हमें थामती हैं,
या हम ही उन्हें छोड़ने से डरते हैं?
क्या यह अपनापन है,
या सदियों पुराना भ्रम?
खुले आसमान की ओर
नज़र उठाना इतना कठिन क्यों है?
छोटे-से अपने बसेरे में
बड़ा सुकून तलाशना
इतना असंभव क्यों लगता है?
शायद इसलिए कि
हम जड़ों और ज़ंजीरों में
फ़र्क ही नहीं कर पाते।
Copyright Renu Vyas

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