निसन्देह , प्रेम है हमें
मगर यह कोई साधारण प्रेम नहीं।
यह बाँसुरी की तानों के बीच की खामोशी है,
एक मौन जो गाता है,
एक विरह जो कभी थमता नहीं।
राधा और कृष्ण की तरह
ना साथ चलने की ज़रूरत,
ना हाथ थामे रहने की
फिर भी हर चाँदनी रात में मिलते हैं,
हर हवा की साँस में बसे रहते हैं।
एक-दूसरे पर अधिकार नहीं जताते
ना कोई वचन, ना कोई दावे
फिर भी एक-दूसरे के हैं,
जैसे नदियाँ समुद्र की होती हैं,
जैसे चाँदनी चकोर की होती है।
हमारा प्रेम अधिकार में नहीं,
एहसासों में है
दिल की गहराइयों में है
उस विरह में जो कभी पूरा नहीं होता
हमारा “हमेशा” शब्दों से परे है,
स्मृतियों के मंदिर में जीवित,
समय की कोमल परतों में बसा
जहाँ प्रेम कभी समाप्त नहीं होता,
बस…
रूप बदलता रहता है।
Copyright Renu Vyas

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