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Tuesday, September 16, 2025

मुझे जानना हो तो..

 मुझे जानना हो तो


मुझे जानना हो तो,

यूँ ही मत पूछो मेरा नाम 

मेरी कविताओं में ढूँढ़ो मुझे,

उन अधूरी सी बातों के बीच के जज़्बातों में।


कभी मिलूँगी इक झलक बनकर

किसी छिपी हुई सी पंक्ति में,

या बनके ठहरी हुई साँस

दो मिसरों की दूरी में।


मैं शायद वो किरदार हूँ

जिसे तुमने नज़रअंदाज़ कर दिया,

जो चुपचाप हँसता रहा

और कुछ भी कह नहीं पाया।


या फिर वो अध्याय हो सकती हूँ

जिसे तुमने छोड़ दिया था बीच में,

जहाँ उदासी और तमन्ना

कभी शब्दों में सिमटी थी, कभी खामोशी में।


मैं मिलती हूँ अधूरे अंत में,

रुकी हुई किसी रेखा में,

एक शब्द और उसके अर्थ

के बीच की किसी रेखा में।


तो अगर सच में जानना है मुझे,

मेरी आँखों में मत देखो 

मेरी कहानियों में ढूँढ़ो मुझे,

जहाँ मैं सचमुच रहती हूँ,

बिन कहे सब कुछ कहती हूँ।


Copyright Renu Vyas 

Sunday, September 14, 2025

निसन्देह , प्रेम है हमें

 


 निसन्देह , प्रेम है हमें 
मगर यह कोई साधारण प्रेम नहीं।
यह बाँसुरी की तानों के बीच की खामोशी है,
एक मौन जो गाता है,
एक विरह जो कभी थमता नहीं।

राधा और कृष्ण की तरह
ना साथ चलने की ज़रूरत,
ना हाथ थामे रहने की 
फिर भी हर चाँदनी रात में मिलते हैं,
हर हवा की साँस में बसे रहते हैं।

एक-दूसरे पर अधिकार नहीं जताते 
ना कोई वचन, ना कोई दावे 
फिर भी एक-दूसरे के हैं,
जैसे नदियाँ समुद्र की होती हैं,
जैसे चाँदनी चकोर की होती है।

हमारा प्रेम अधिकार में नहीं,
एहसासों में है 
दिल की गहराइयों में है 
उस विरह में जो कभी पूरा नहीं होता 

हमारा “हमेशा” शब्दों से परे है,
स्मृतियों के मंदिर में जीवित,
समय की कोमल परतों में बसा
जहाँ प्रेम कभी समाप्त नहीं होता,
बस…
रूप बदलता रहता है।

Copyright Renu Vyas 


Wednesday, September 10, 2025

जड़ें या ज़ंजीरें


 जड़ें या ज़ंजीरें

जड़ों से जुड़ना पहचान है,

पर क्या हर पहचान को

ढोना ज़रूरी है?


क्यों परम्पराएँ,

जो सुख न दें,

फिर भी हमारी नियति बन जाती हैं?


क्यों ठहरते हैं हम

उन दीवारों के भीतर,

जहाँ सम्मान से ज़्यादा

चोटें मिलती हैं?


क्या जड़ें सच में हमें थामती हैं,

या हम ही उन्हें छोड़ने से डरते हैं?

क्या यह अपनापन है,

या सदियों पुराना भ्रम?


खुले आसमान की ओर

नज़र उठाना इतना कठिन क्यों है?

छोटे-से अपने बसेरे में

बड़ा सुकून तलाशना

इतना असंभव क्यों लगता है?


शायद इसलिए कि

हम जड़ों और ज़ंजीरों में

फ़र्क ही नहीं कर पाते।


Copyright Renu Vyas 


Sunday, July 20, 2025

The Extra

 


“The Extra”


I often wonder

what am I doing here,

in this moment, this breath, this blur

of other people’s stories

where I am the pause, never the plot.


I wake, I move, I smile in place

like furniture no one chose

just inherited,

kept out of habit or

for lack of energy to rearrange.


Some days, I feel like

an ellipsis at the end of a sentence

that would’ve been just fine without me

maybe sharper, cleaner,

more poetic in my absence.


I see their laughter stretch

like light through stained glass,

and I - dust motes

floating in that spill of joy

not the color, just the clutter.


Would it matter

if I quietly stepped aside ?

Would their skies seem wider,

would their rooms breathe easier,

would the silence feel more pure ?


Perhaps I am

just that extra chair in the corner

not ugly, not needed,

but once it’s gone,

the space sings in symmetry again.


And still,

I exist

aware, unsure,

a whisper in a world

of louder, lovelier songs.


Just wondering

what this breath is for,

if anyone hears it

but me.


Copyright Renu Vyas 


Thursday, June 19, 2025

कभी यहाँ ज़िंदगी बसा करती थी..


 गाँव के सिरे पर एक पुरानी हवेली खड़ी है - जर्जर, अकेली, और ख़ामोश। कभी इसकी दीवारों पर रंग हुआ करता था, आज वहाँ सीलन और दरारें हैं। लकड़ी के दरवाज़े अब कराहते हैं, जैसे समय का बोझ सहते-सहते थक चुके हों। दीवारों पर लिपटी बेलें और झूलते जाले इस बात की गवाही देते हैं कि बहुत वक़्त गुज़र चुका है।


मगर अगर आप ध्यान से सुनें… बहुत ध्यान से… तो कुछ आवाज़ें अब भी गूंजती हैं।

चूड़ियों की खनक, पायल की छन-छन, हँसी की खिलखिलाहट… जैसे ज़िंदगी अब भी कहीं छिपी बैठी हो। जैसे हवेली की दीवारें आज भी उन लम्हों को अपने भीतर समेटे हुए हों।

कभी यह हवेली महज़ एक इमारत नहीं थी — यह एक धड़कता हुआ जीवन था।

यहाँ सुबहें रंगोली और तुलसी के चारों ओर भजन से शुरू होती थीं। दोपहरें बच्चों की दौड़-भाग में बीतती थीं। शामें कहानियों से सजी होती थीं, और रातें संगीत, चाँदनी और महफ़िलों की गवाह होती थीं। आंगन में पेड़ की छांव में कितने ही फैसले लिए गए, कितनी चिट्ठियाँ लिखी गईं, और कितनी ही आँखें नम हुईं।

आज वही हवेली सूनी है। खामोश। मानो वह भी किसी अपने को खो चुकी हो।

इसकी दीवारें अब सिर्फ ईंट-पत्थर नहीं, बल्कि यादों की कब्रगाह हैं। हर कमरा एक किस्सा है, हर बंद खिड़की एक अधूरी कहानी। हवेली अब इंतज़ार नहीं करती - वह सिर्फ बचे हुए सन्नाटे में साँस लेती है।

और इस सन्नाटे में एक गहरा संदेश छिपा है - ज़िंदगी क्षणभंगुर है।

हम जो कुछ भी बनाते हैं, संजोते हैं, जीते हैं… वह सब समय के साथ मिटता चला जाता है।

जो रह जाती है, वह है गूंज।

शायद हवेली आज भी किसी को पुकार रही है - किसी ऐसे को जो उसे सजाए नहीं, बल्कि समझे।

जो उसकी देहरी पर बैठे, एक दीप जलाए और कहे -

“मैं तुझे देखती हूँ… और तुझे याद करती हूँ।”

क्योंकि कुछ घरों का मक़सद बस रहना नहीं होता -

उनका होना ही एक श्रद्धांजलि है।


क्या आपने भी कभी ऐसा कोई घर देखा है, जो ख़ुद एक दास्तान बन चुका हो ?


Copyright Renu Vyas 


Saturday, June 14, 2025

कभी चुप रह कर भी देख लीजिए…




कभी चुप रह कर भी देख लीजिए…

हर बार बोलना ज़रूरी नहीं,

हर जंग जीतना जरूरी नहीं।

कुछ बातों को वक्त पे छोड़ दीजिए,

शायद सुकून पा लेंगे।


जब लफ़्ज़ तीर बन जाएं,

और दिल घावों से भर जाए,

तब मौन की चादर ओढ़ लीजिए,

शायद टूटते रिश्ते फिर जुड़ जाएँ।


हर सच ज़ाहिर करना जरूरी नहीं,

हर तकरार में आवाज़ उठाना जरूरी नहीं।

कभी किसी की नज़र से भी सोचिए,

कई ग़लतफ़हमियाँ मिटा लेंगे।


कभी अहं को किनारे रखकर,

मुस्कराकर सुन भी लीजिए,

रिश्तों की दरारें भर जाएंगी,

दिल फिर से करीब पा लेंगे।


तो कभी चुप रह कर भी देख लीजिए 

शायद कई रिश्ते बचा लेंगे 


Copyright Renu Vyas 

Thursday, May 29, 2025

मेरा दिल ढोकले में अटका !


 मेरा दिल ढोकले में अटका

प्यार क्या होता है ? कोई कहता है वो बारिश की बूँदों में होता है, कोई कहता है चाँदनी रातों में। पर मेरे लिए ?  मेरा प्यार न बारिश से है, न चाँदनी से, मेरा प्यार एकदम अलग है – गोल, प्यारा, गर्म-गर्म, खुशबूदार… और नाम है राजस्थानी ढोकला !

जी हाँ, वही – वो चमत्कारी गोल-गोल चीज़ जो ना सिर्फ पेट भरती है, बल्कि दिल भी। उसकी खुशबू जैसे मेरी आत्मा को सहला देती है। जैसे ही किचन से वो भाप उठती है और नाक से टकराती है, मैं कुछ देर के लिए इंसान नहीं रहती – मैं एक प्रेम में पागल आत्मा बन जाती हूँ, जिसकी दुनिया बस एक थाली में सिमटी होती है, जिसमें होता है – ढोकला , थोड़ा घी और एक चुटकी चीनी !

अब आप सोच रहे होंगे कि ये तो गुजराती डिश है, पर ठहरिए जनाब, राजस्थानी ढोकला एक अलग ही कला है। इसमें सिर्फ आटा नहीं, बल्कि कई प्रकार की दालें – मूंग, चना, अरहर,  सबका मेल है ! ये ढोकला नहीं, दालों की ‘लव मैरिज’ है, जिसमें हर स्वाद का योगदान है। और वो गोल आकार ? ओह ! जैसे ये कह रहा हो  “प्लीज़ मुझे खाओ, मैं तुम्हारे लिए ही बना हूँ !”

मेरे जीवन में अगर कोई Candlelight dinner हो सकता है, तो वो होगा एक स्टील की थाली, उसमें गर्मागर्म ढोकला , ऊपर से घी टपकता हुआ, और बगल में थोड़ी सी चीनी ,हरी चटनी और मिर्ची और एक candle. अरे भई, लैला मजनू की जोड़ी तो फिर भी पुरानी हो गई, मेरे लिए तो ढोकला -घी-चीनी ही ultimate couple goals हैं !

कुछ लोग गुलाब भेजते हैं प्यार में, मैं तो कहती हूँ, ढोकले भेजो, समझ जाएगा सामने वाला कि सच्चा प्यार क्या होता है।

तो अगली बार जब आप उदास हों, दिल टूटा हो या बस भूख लगी हो, अपने किसी पुराने आशिक को याद मत करना… बस एक प्लेट राजस्थानी ढोकले खाना ।

क्योंकि मोहब्बत चाहे जितनी भी झूठी निकले…

ढोकला कभी धोखा नहीं देता ! ❤️😋

Renu Vyas 

Tuesday, May 27, 2025

गुलज़ार, नाना पाटेकर और मैं


कुछ अनुभव होते हैं जो शब्दों में बाँधने की कोशिश करो तो भी फिसल जाते हैं  - जैसे हवा में बसी महक, या किसी पुराने गीत की धुन जो सीधे दिल के किसी कोने को छू जाती है। गुलज़ार की कविता पढ़ना और नाना पाटेकर को बोलते हुए सुनना  - ये सिर्फ़ अनुभव नहीं, ये मेरे लिए एक पलायन है, एक ऐसी दुनिया का दरवाज़ा, जो सिर्फ़ मेरी है।


जब गुलज़ार लिखते हैं :

“इक सफ़र है जो ख़त्म ही नहीं होता…”

तो लगता है जैसे उन्होंने मेरे ही दिल की तहों में उतरकर कुछ लिखा है। जैसे मेरी ही उलझनों को, मेरी ही चुप्पियों को शब्द दे दिए हों। उनकी हर नज़्म में कोई पुरानी याद, कोई भूला हुआ अहसास, कोई अधूरी बात मिलती है, जो अबतक सिर्फ़ मेरी थी।


और फिर जब नाना पाटेकर की भारी आवाज़ में वो शब्द सुनती हूँ —

“कैसे बताऊँ मैं तुम मेरे लिए क्या हो…”

तो वो आवाज़, उन शब्दों के साथ मिलकर, किसी जादू की तरह मुझे मेरी ही दुनिया में पहुँचा देती है। एक ऐसी दुनिया जहाँ शोर नहीं है, बस भावनाओं की धीमी-धीमी सरगम है। जहाँ कोई मुझे समझता है, बिना कहे। जहाँ ये शब्द जैसे सीधे मेरे लिए बोले गए हों, मेरे अंदर गूँजने के लिए।


गुलज़ार के अल्फ़ाज़ और नाना पाटेकर की अदायगी मिलकर एक ऐसा कोना रचते हैं मेरी आत्मा में, जहाँ मैं सबसे ज़्यादा सच्ची होती हूँ। कोई मुखौटा नहीं, कोई भूमिका नहीं। बस मैं, मेरे एहसास, और वो शब्द जो जैसे मेरे लिए ही लिखे गए, मेरे लिए ही बोले गए।


ये मेरी दुनिया है - कल्पनाओं की, भावनाओं की, संवेदनाओं की। 


और फिर कभी-कभी… मैं बस आँखें बंद कर लेती हूँ, और अपने मन की आवाज़ में उनके लिए गाती हूँ —

“ये कहाँ आ गए हम यूँ ही साथ चलते चलते…”


जैसे मैं यह गीत गुलज़ार और नाना पाटेकर के लिए ही गा रही हूँ। मेरे दिल में, हम तीनों — मैं, गुलज़ार साहब और नाना — एक साथ एक लंबा सफ़र तय कर चुके हैं। एक ऐसी दुनिया की ओर जहाँ हर शब्द कविता बन जाता है, हर खामोशी आवाज़ हो जाती है, और हर एहसास को कोई कह देता है — कभी कागज़ पर, कभी आवाज़ में।


यह एक कल्पना है शायद, पर मेरे लिए यह पूरी तरह सच्ची है। एक जीवन हमने साथ जिया है — कागज़, आवाज़, और धुनों के माध्यम से। एक ऐसा जीवन, जो बाहर से नहीं दिखता, पर मेरे भीतर पूरी शिद्दत से जीया गया है।


शुक्रिया गुलज़ार साहब, शुक्रिया नाना पाटेकर — मेरी उस अदृश्य लेकिन सबसे सच्ची दुनिया को आकार देने के लिए।


Copyright Renu Vyas